बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

आज का हाईटेक प्यार!

"यह इश्क नही आसां, बस इतना समझ इतना समझ लीजिये,
एक आग का दरिया है, डूब कर जाना है"

जिगर मुरादाबादी ने यह शेर ६०-७० के दशक के प्रेम-प्रसंगों को देखकर लिखा होगा। अभी के प्यार लीलाओं को देखकर जिगर मुरादाबादी अपनी सोच बदलने पर मजबूर हो जायेंगे। जो लोग ६०-७० वाले प्यार के परिभाषाओ पर अभी भी यकीं रखते है, उन्हें बता दूँ की यह 'प्यार' अब बाजार का एक बड़ा बिषय है। तकनीक ने अब इसे एक उद्योग बना दिया है। प्यार अब तो एक कारोबार है जो इन्टरनेट , अखबार और टेलिविज़न शो पर चलता है। और इस कारोबार का भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़िया पैठ है।

यदि आपने प्यार करने का मन बना लिया है तो अब वो आपको "वो पहली नजर" इन्तजार में समय बरबाद न करें। इन्टरनेट पर ऐसे सैकडों वेबसाइट है जो प्यार करवाने का पुण्य काम करते है। आपको बस यहाँ सदस्य बनाना होगा और कुछ शुल्क भी देना होगा। याहू मेस्सन्जेर खोलिए, इन्स्टंट मेसेज वाली बॉक्स में ASL लिखकर भेजिए। सामने कोई मिल गयी तो फ़िर शुरू हो जाइये। पहले मुझे भी ASL का मतलब पता नही था। दरअसल मैं भी एक बार इस प्रश्न से गुजरा। एक बार मेरे बॉक्स में प्रकट हुआ-"ASL PLS मैंने इसका मतलब पूछा तो सामने से सवाल आया,"AGE, SEX AND LIVING क्या है? मैंने मेल बताया तो अगला मेसेज आया ही नही। मै समझ गया भाई साहेब फेमेल ढूंढ़ रहे है। मै तो इन्टरनेट पर होने वाले प्यार की गति से प्रभावित हूँ। शब्द ASL से ही आशिक सामने वाले के जैसे सारा कुंडली जान लेता है। बात बनी  तो ठीक है , वरना अगले से-ASL । यदि कोई बिंदास टाइप की मिल गयी तो अगला प्रश्न रंग, फिगर, या पहने गए अन्तर-वस्त्र से होता है। फ़िर शुरू होता है रसीली और सेक्सी बातों का सिलसिला ताकि यौन फंतासी में पुरी तरह डुबकी लगाया जाए। यदि किसी ने अपनी आई डी किस्सिंग गर्ल के नाम से बनाया हुआ है तो MACHO MAN टाइप के लोग उस पर टूट पड़ते है। कई नेट सर्विस देनी वाली कंपनी ने तो बाकायदा डेटिंग और स्पीड डेटिंग का कारोबार चला रखा है जो लड़के-लड़कियों के प्रस्ताव और संदेशो को विज्ञापन की तरह इस्तेमाल करती है। यह तो हुई वेब दुनिया का प्यार।

प्यार तो अब टेलिकॉम कंपनियां ने भी बांटना शुरू कर दिया है खुल्ले के भाव में। आप किसी भी टेलिकॉम कंपनी के सर्विस ले रहे हो प्रतिदिन आपके पास एक मेसेज आयेगा -"looking for sexy and hot partner??? now just msg on 0xxxxxxx। Rs. 6 per msg. . कुछ इस तरह। ५-६ रुपये में आपका प्यार आपके फ़ोन में। आपको सिर्फ़ मेसेज करना पड़ेगा। फ़ोन वाला प्यार का एक तरीका और भी है। अखवारों में रोज एक विज्ञापन आता है-dial on 00xxxxxxx to talk hot indian girls। इंडियन grls se बात करने के लिए ISD नम्बर का चक्कर मुझे समझ में नही आता है।

यह तो कुछ भी नही। अब तो चैनल वाले भी T.V पर लाइव शादी करवा रहे है। टेलिविज़न के इतिहास में पहली बार कुछ दिन पहले राखी सावंत ने स्वयंवर रचाया। महीने भर वह १६ लड़को के साथ दिल तोड़ने-जोड़ने का खेल खेलती रही और जनता  आंखें गडाकर देखती रही। चैनल भी अपना TRP बढाती रही। यही नौटंकी अब राहुल महाजन करने वाले है।

आजकल १५-१८ के बीच के लड़के-लड़कीयओं के बीच एक ट्रेंड चला हुआ है। अखवारों में अपने प्रेम-पत्र छपवाने का। एक अलग से बॉक्स बना होता है "तेरे नाम के लिए"। एक लड़का अपनी प्रेमिका के लिए एक संदेश छपवाता है-"नीलू डार्लिंग, तुम चाँद से भी ज्यादा सुंदर हो। मै तुम्हे दिलोजान से प्यार करता हूँ । तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हु। तुम्हारा रॉकी। तो ऐसे चलता रहता है प्यार में जान देने की बातें। प्रेमिका के नाम ख़त छपवाकर ऐसे खुश होते  है जैसे उनके लिए ताजमहल बनवा दिया हो। अखवार और फ़ोन वाले ऐसे हजारों रॉकी से लाखो कमाते है।

तो इस प्रकार बहुत बिंदास और हाईटेक हो गया है प्यार करने के तरीके. यह सारे तरीके तो अलग-अलग है लेकिन एक चीज इनमे सामान है - बाजारवाद. अब तो प्यार एक ब्रांड है जिसमे करोड़ो का निवेश होता है. करीब साल भर पहले एक फिल्म देखा था- गौड तुस्सी ग्रेट हो! उसके एक सीन में हीरो को झूठ पकड़ने वाली मशीन पर बिठा कर हिरोइन पूछती है क्या तुम  मुझसे सच्चा पर करते हो? मुझे लगता है जल्द ही सड़को पर नाइ की दुकान की तरह 'मशीन से प्यार का परिक्षण' की दुकान खुलेगी.   प्रेमी-प्रेमिका वहां आएंगे और एक दुसरे का टेस्ट करेंगे. टेस्ट हो जाने के बाद दुकानदार उन्हें सर्टिफिकेट देगा.
  धंधा अच्छा जमेगा. सोच रहा हूँ इसकी शुरुआत मै ही कर दूँ. यदि आप किसी से प्यार करते या करती है तो और आपको अपने पार्टनर पर थोडा कम विश्वास है तो आपका स्वागत है. मेरे दुकान का उद्घाटन करने स्वर्ग से लेना-मजनू आएंगे. मेरी दूकान का नाम और पता आपको अगले लेख में बताऊंगा.
धन्यबाद!!!!!!!!!!!!!!!!

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दिल्ली का फ़िल्मी इतिहास-भाग 2

गत से आगे........




महिलाओं का सिनेमाहाल में आना ज्यादा दिनों तक नही रहा। अंग्रेजी फिल्मो में दिखाया जाने वाला चुम्बन दृश्यों से उन्हें परहेज होने लगा और जल्दी ही उन्होंने यहाँ से कदम मोड़ लिए। जब बाद में भारत में फिल्मो का निर्माण शुरू हुआ और उनकी लोकप्रियता बढ़ी तो जामा मस्जिद के पास बने संगम थिएटर को १९३० में सिनेमाहाल में परिवर्तन कर दिया गया। साथ ही इसका नाम बदल कर जगत कर दिया गया। जगत टॉकीज नाम से यह सिनेमाहाल अभी भी काम कर रहा है। १९०४ के आस-पास ही न्यू रोयल सिनेमा की शुरुआत हुयी थी। जिस जगह पर आज मोटी सिनेमा बना हुआ है उसकी मालकिन कभी बहादुर शाह जफ़र की बहन बेगम समरू हुआ करती थी। लाला जगतनारायण ने ज्यादा-से-ज्यादा दर्शक जुटाने के लिए फिल्मो का प्रचार करना शुरू कर दिया। लालजी ने एक नायब तरीका निकाला था। दिखायी जाने वाली के चित्रों से सजी ट्राली शहर के विभिन्न इलाकों में घुमाई हटी थी। ट्राली के साथ भोंपू लिए हुए जोकरनुमा एक व्यक्ति होता था जो साथ-साथ फ़िल्म के समय, कलाकार आदि के बारे में जानकारी देता था। उस जोकर को 'जमूरा' कहा जाता था। और भोंपू भी बिजली से चलने वाली नही होती थी बल्कि 'जमूरा' को उसमे बोलना पड़ता था। दिल्ली सिनेमा के इतिहास में एक और रोचक वाकया है। उस समय अधिकतर फिल्मो के टाइटल एक या दो शब्दों के होते थे, फ़िर भी दर्शक उन्हें ठीक से पढ़ नही पाता था क्यूंकि तब पढ़े-लिखे की संख्या बहुत कम थी। इसके लिए सिनेमाघर की ओर से ऐसे कर्मचारी की नियुक्ति की जाती थी जो न पढ़ पाने वालो को टाइटल पढ़ कर सुनाता था। इन लोंगो को 'बताने -वाला' कहा जाता था।



जारी.....

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

दिल्ली में सिनेमा का इतिहास - भाग 1

यदि आप दिल्ली में रहते है और अपने परिवार के साथ फ़िल्म देखने का मानबना रहे है तो निश्चित ही आपके दिमाग में सिनेमाघर का नही बल्कि मल्टीप्लेक्सों के नाम दिमाग में आ रहे होंगे। साकेत और नारायणा के पीवीआर, नेहरू पलैस और पटेल नगर वाला सत्यम या नॉएडा का वेब। है न???? आप ही नही फ़िल्म के सारे शौकीन यही जाते है पुरा मजा लेने के लिए। जगत, रिट्ज़, नोवेल्टी, शीला और बत्रा के बारे में कौन सोचता है? यहाँ भी लोग फिल्मे देखने जाते है लेकिन वो लोग जो अपने अपने बजट को लेकर ज्यादा मजबूर होते है। आज के युवा वर्ग में तो जैसे घृणा है जैसे इन सिनेमाघरों के लिए। मुझे याद है एक बार मै नेहरू प्लेस स्थित पारस सिनेमा से "हैरी पॉटर" देख कर आया था, तो जामिया मिलिया इस्लामिया के कैम्पस मस्तिबाजी में मेरा मजाक उड़ाया गया था।
संक्षेप में, कहें तो यह सिनेमाघर उन लोंगो से कट सा गया है, जो अपने आप को आज के सभ्य सोसाइटी के रहने वाले कहते है। जबकि हकीकत यह है की इन्ही सिनेमाघरों ने दिल्ली में फिल्मो को लाया। भारतीय विद्या भवन के लाइब्रेरी में रखे सिनेमा के इतिहास वाली पुस्तकों से मुझे पता चला की कैसे इन सिनेमाघरों ने दिल्लीवालों को चलचित्र से रूबरू कराया।
कहा जाता है की १९१३ या १९१४ में माडर्न थिएटर ने दिल्ली में पहला सिनेमाघर चालू किया, जिसका नाम था 'एलिफिंस्टन'। कुछ जानकारों का मानना है की फतेहपुरी में स्थित 'कोरोनेशन' दिल्ली का पहला सिनेमाघर था। बाद में यह जल गया था और अब उसी स्थान पर 'कोरोनेशन' होटल है। इस समय मूक फिल्मो का दौर था, इसलिए उस समय दिल्ली में केवल अमेरिका और ब्रिटेन में बनाई गयी फिल्मे ही दिखाए जाते थे। अधिकतर दर्शक अंग्रेज फौजी या गोरे ही होते थे। बाद में धीरे-धीरे अंग्रेजों के देखा देखी दिल्लीवालों को इसका शौक चढ़ने लगा। इसके लिए सेठ जगतनारायण ने रास्ता असं किया । उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से 'एलिफिंस्टन' सिनेमा खरीद लिया और उसका नया नाम 'नोवेल्टी' रखा। यह सिनेमा हॉल आज भी काम कर रहा है जिसका संचालन अब उनके बेटे सेठ विजयनारायण द्वारा किया जा रहा है।
सेठ जगतनारायण ने बाद में १९२८ के आस पास वितरण का भी अपना काम सुरु किया। धीरे-धीरे वे तीन सिनेमाहाल के मालिक बन गए। वे सिनेमाघर थे- जगत, नोवेल्टी और रिट्ज़। इन तीन सिनेमाघरों में दिल्ली के अंग्रेजों के अधीन होने के कारण सिर्फ़ अंग्रेजी फिल्मे ही दिखायी जाती थी। उस समय सिनेमाहाल में प्रवेश की सबसे कम टिकेट दर ४ आने थी और सबसे ज्यादा १ रूपया। फ़िल्म देखने आने वालो में पुरूष ही होते थे, लेकिन जब हिंदू धर्मों पर आधारित पौराणिक फिल्मे बनने लगी तो महिलाओं ने भी फ़िल्म देखने के लिए आना शुरू किया, जिसे देखते हुए प्रबंधन को महिलाओं के लिए अलग बैठने का व्यबस्था करना पड़ा।

जारी........

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

आज के भोजपुरिया गनवा...

पिछले दिनों मै अपने नालंदा स्थित गाँव गया जा रहा था। रास्ते में बस में एक भोजपुरी गाना बज रहा था--"मिस कॉल मारा तारु किस देबू का हो, अपने मशिनिया में पिस देबू का हो...." दो दिनों के गहन अध्ययन के बाद मुझे इस गाने का मतलब हिन्दी में समझ में आया। मै आश्चर्यचकित रह गया था। भोजपुरी संगीत ने सारी सीमाओं को तोड़कर इतनी तरक्की कर ली है!

बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के मध्यवर्गीय लोग शाहरुख़ खान से ज्यादा मनोज तिवारी और "निरहुआ" को जानते है। यह अजीब बिडम्बना है की भोजपुरी फ़िल्म जगत में वही स्टार बनते है जो पहले हित गायक रह चुके होते है। या कन्हें तो पब्लिक उसी को स्वीकार करती है जो "हिला देने वाला" गाना भी जानता हो। फिल्में भी इन्ही लोंगो की हिट होती है क्यूंकि ये ड्राईवर, कंडक्टर और पन्वारियोंके आदर्श होते है। सत्तर-अस्सी के दशक के भोजपुरी गाने किसको याद है? हाँ, मेरी माताजी को १९६१ में आई फ़िल्म "गंगा मैया तोहरे पियरी चधैवो" का टाइटल गाना पुरा याद है। इस गाने को मैंने यू-ट्यूब पर जाकर देखा। बनारस की घांट, साफ़-सुथरी गंगा की धारा, जिसमे पचासों नांव और उन्ही नावों में से एक पर बैठी पद्मा खन्ना गीत गाती हुयी। सब कुछ इतना मनोरम की बस उसमे डूब जाने को मान करता है।

पद्मा खन्ना तब की भोजपुरी सुपर स्टार थी। अब वह अमेरिका में रहती है और शास्त्रीय नृत्य सिखाती है। उनसे एक बार भोजपुरी फ़िल्म जगत के बारे में कुछ पूछा गया तो उन्होंने दो टूक कहा की अब के भोजपुरी गानों में अश्लीलता और फूहड़पन के अलावा कुछ नही है। ।यह कानफोडू डिस्को और डीजे तो अभी आया है। दशक पहले पुरे देश में शादिओं में शारदा सिन्हा के गीत बजा करते थे। भारत शर्मा "व्यास" और बालेश्वर के भोजपुरी गीत आज भी पौढ़ लोंगो के जुबान पर आ जाता है।

भोजपुरी का बाजार अब ८०० करोड़ रुपये का हो गया है। इस बाजार में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी के लिए अश्लीलता परोसने की होड़ सी लगी है। वो एल्बम हिट हो जाता है जिसमे जीजा-साली के अश्लील संवाद होते है। जीजा-साली से मुझे याद आया होली के गीत के बारे में। होली के दिनों में यदि अपने भोजपुरी के जीजा-साली और देवर-भौजी वाला गीत सुनकर यदि ठीकठाक अंदाज लगा लिया तो आप दांतों टेल उंगली चबा लेंगे। सब मिला कर ऐसा हो गया है भोजपुरिया संगीत। बिहार में तो सीडी क्रांति ऐसे चल रहा है जैसे भारत में मोबाइल क्रांति। दिल्ली में मुझे १०-१२ रुपये में एक खाली सीडी मिलता है, लेकिन बिहार के छोटे -मोटे बाजार में भी ८-१० रुपये में आपको एक भोजपुरिया एल्बम मिल जायेंगे, जिसमे १०० से अधिक गाने होंगे।

भोजपुरी कैफी आजमी, जेपी और बिस्मिल्लाह खान का भाषा रहा है लेकिन निश्चित ही इन भोजपुरी गीतों ने भोजपुरी को दुनिया से काट दिया है। जब "महुआ" नाम से भोजपुरी के अलग चैनल खुले तो भी मुझे लगा था की यह भी दंतनिपोरी और फूहड़पन ही बेचेंगे , लेकिन महुआ पर आने वाले कार्यक्रम देखकर भोजपुरी भाषा वालो को कुछ आस जगी है। हर तरह के कार्यक्रम ला रही है धीरे-धीरे । बिल्कुल मिटटी से जुड़ी हुयी। खासकर "सुर-संग्राम"। इस प्रोग्राम तो लोंगो की सोच बदल दी। नेताओं ने सन २००० में बिहार को दो हिस्सों में बाँट दिया। जिसे मिलाने का काम कर रही है यह कार्यक्रम। बहुत अच्छा लगा यह देखकर की संगीत के इस अखाडे में बिहार और झारखण्ड के धुअन्धर एक साथ है। दो टीम है -बिहार और उत्तरप्रदेश। यहाँ तो बिहार और झारखण्ड साथ -साथ है। नेताओं के सोच से बिल्कुल अलग। ऐसा नही है की आज के सारे भोजपुरी गीत ही सुनाने लायक नही है। देवी के "बहे के पुरवा रामा ....." और "परदेसिया...." ऐसे ही गीत है जिसमे असली भोजपुरिया का स्वाद है। फिल्मों की बात किया जाए तो कुछ दिनों पहले आई "कब ऐबहू अंगनवा हमार...." जैसे फिल्मों में काफी कुछ है देखने लायक। संक्षेप में , भोजपुरी के लिए अब कम से कम कला क्षेत्र से जुड़े हुए लोंगो को सोचने की जरुरत है।

रविवार, 23 अगस्त 2009

गुलामी के एक साल और....

जबकि देश अपनी आजादी की ६२ वीं वर्षगांठ मना रही हो, स्वतन्त्रा दिवस के एक दिन बाद समक्ष में अपनी पहली लेख के शीर्षक "गुलामी के एक साल और" रखना थोड़ा अजीब सा लगता है। मै कोई बड़ा लेखक होता तो यह तय था की मुझपर देशद्रोही होने का मुकदमा चल जाता। यूँ तो मीडिया बाकि के ३६४ दिन सरकार के नीतियों को पानी पी पीकर कोसता है लेकिन १५ अगस्त के दिन वह भी प्रधानमंत्री के भाषण और बंदूकों की सलामी प्रसारित करता रहता है। लेकिन मै आज के दिन आपको पुरे साल घटे घटनाक्रम का लेखा-जोखा देता हु जिससे स्पष्ट होता है की गुलामी का वायरस देश में अभी भी है... मै मानता हु की ६३ साल पहले भारत को ब्रिटिश उपनिवेश से आजादी मिल गयी थी और इसके बाद देश में फैली कुछ अन्य प्रकार के दोष जैसे बाल-विवाह, अशिक्षा, जातिवाद और कुछ हद तक गरीबी से भी भरता को किस्तों में ही सही लेकिन आजादी मिल रही है। भारत एक विश्वशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। जाहिर सी बात है, आजादी के बाद हुई भारत की प्रगति संतोषजनक है। लेकिन बात यदि पिछले साल की कि जाए तो ऐसा लगा जैसे सरकार विषम परिश्थितियो में मजबूती से लड़ने के बजाये शार्टकट अपनाती नजर आई। मै मानता हूँभारत के नेताओं में दूरगामी दृष्टि की कमी ही वह तत्व है जिसके कारण हम ख़ुद को गुलामी के जंजीर में कसमसाते हुए महसूस करते है। बहुत ज्यादा तो नही यहाँ मै कुछ मुद्दों का जिक्र करना चाहूँगा जिसने बीते साल भारत की आजादी और संप्रभुता को सर्मशार किया है।

संसद में नोटों की गड्डी...

पूरा देश सांसत में था जब बीजेपी के तीन साँसद ने यह कहते हुए संसद में नोटों की गड्डी फहरा दी की यह पैसे कांग्रेस ने उन्हें एटॉमिक डील के पक्ष में वोट करने के लिए भिजवाई है। लोग टीवी के सामने बैठे थे सरकार गिराने और बनने के मसालेदार ड्रामा देखने और उन्हें ऊपर से मुफ्त में यह दाल में तड़का मिल गया। खैर, कांग्रेस की सरकार बची और जैसे-तैसे अटोमी डील पर हस्ताक्षर हुए। यह अलग बात है की भारत के बुद्धिजीविओं तक को नही पता की सरकार ने ऐसी कौन सी चीज गिरवी रखकर इस परमाणु अधिकार को ख़रीदा। लेकिन इस नोट कांड के बाद अमेरिका के मीडिया ने भी छापा की भारत की कांग्रेस सरकार ने इस डील के लिए सांसदों को मंहगे डर पर ख़रीदा। हम अमेरिकी मीडिया को चुप नही करा सकते। वे स्वतंत्र है किसी चीज पर कुछ पर बोलने के लिए। गुलाम तो हम है, हमारे सांसद है नोटों की गड्डी के। सत्ता के सुख के, और "नोट कांड" इसका सबसे बड़ा उदहारण है।

भारत की अमेरिका परस्ती.....

भारत करीब पिछले दस सालों से अमेरिका की सरपरस्ती करता आ रहा है। लेकिन पिछले एक साल में भारत ने कितनी मुद्दों पर कितनी बार अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाई है, मेरे लिए यह गिनवा पाना मुश्किल है। कई बार तो अमेरिका के इशारे के बिना भी भारत ने ऐसा किया। विश्वशक्ति के गहरे मित्र बनकर इतराने के साथ-साथ भारत को यह भी सोचना चाहिए की बदले में उसने क्या खोया है। इरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाईपलाईन खटाई में पड़ा हुआ है। अपने पड़ोसी समुदाय में जिनका हम कभी गार्जियन हुआ करते थे उनके नजरों में हम कही के नही रहे। श्रीलंका तमिलों के मुद्दे पर हमें विलेन मानता है। कुछ दिन पहले नेपाल के निवर्तमान प्रधानमंत्री प्रचंड ने आरोप लगाया की उसकी सरकार गिराने के पीछे भारत है। हमारी किरकरी चारो तरफ़ हुयी है। विश्वशक्ति का इतना ज्यादा सरपरस्ती से ऐसा नही लगता की हम उसके इशारे पर नाचने वाले बन्दर हैं।

विश्व का सबसे बड़ा फिदायीन हमला भारत पर....

देश का बच्चा-बच्चा जानता है। यह नही की किस प्रकार १० आतंकियों ने मुंबई में घंटों खुनी खेल खेला। बल्कि यह भी की वे कहाँ से आयें थे और किसके इशारे पर यह सब कुछ कर रहे थे। कम से कम एक -तिहाई देशवासी यह अपेक्षा कर रहा था की भारत सीमा पर आतंकियों के ठिकाने पर कारवाई करेगा। लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ। इस बार तो भारत के पास एकमात्र जिन्दा पकड़े गए आतंकी कसाब के बयां और भी बहुत से पुख्ता साबुत थे। मई तो फिर भी इसके बाद भारत का पाकिस्तान पर आक्रामक दबाब बनाये रखने से संतुष्ट था। लेकिन इसी बिच अभी कुछ दिन पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी मिस्त्र के शर्म-अल-सेख में जाकर देश को शर्मशार कर दिया। उन्होंने वहां पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त साझा का बयां दे दिया। उन्होंने लगभग यह कह दिया की वे पाकिस्तान के साथ बातचीत जारी रखेंगे । पाकिस्तान आतंकियों को पनाह देना जारी रखेंगे और हम उनके साथ बातचीत जारी रखेंगे। यह हमारी विदेश नीति का सबसे विकृत रूप है। जैसे हम पाक सरंक्षित मुट्ठी भर आतंकियों के गुलाम हों। जिनके आगे हमने शीश नवाना सिख लिया है। ठीक एक गुलाम की तरह।तो इस प्रकार मेरे लिए तो गुलामी के एक साल और। समूचे देशवासी इस दिन को हर्ष में दुबे रहते है क्यूंकि इस दिन १५ अगस्त को एक आजाद भारत का जन्म हुआ था। मै भी खुशियाँ मनाता हूँ लेकिन भारत में आजादी के जन्म के कारण से ज्यादा इस कारण की इस दिन मेरा भी जन्म हुआ था। इसमे कोई दो राय नही की मै मुझे बहुत ज्यादा ऐसा नही लगता की मै एक संपूर्ण स्वतंत्र देश का वासी हूँ क्यूंकि आजादी महसूस करने के लिए किसी भी गुलामी के तत्वों का न होना बहुत जरूरी है।

Written By- Narottam Giri