गुरुवार, 11 नवंबर 2010

वाह सत्यजीत दा....

आज अचानक मेरा S.R.F.T.I में प्रवेश लेने की कोशिशों को और हौसला मिल गया. दरअसल आजकल मैं यहाँ प्रवेश लेने के लिए पढ़ रहा हूँ..  ज्यादातर पढाई तो ऑफिस में हीं  होता है..syllabus के प्रश्नों के उत्तर खोजने में. खोजते-खोजते सत्यजीत रे के बारे में बहुत रोचक जानकारियाँ मिली. पता चला की कई चीजों में वो अकेले हैं बस.

        यों तो सत्यजीत रे ने कुल 29 फिल्में और 10 डाक्यूमेंट्री बनाई थीं,कहते हैं कि वे अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के बाद कुछ और न बनाते तो भी विश्व सिनेमा मे अमर हो जाते। उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी के लिए क्रिएटिव विजुअलाइजर,ग्राफिक डिजाइनर आदि के रूप मे 12 वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया था। संभवतः,वे अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने फिल्म निर्माण की हर विधा में योगदान किया है। इटली की फिल्म 'द बाइसाइकिल' थीफ से बेहद प्रभावित थे और कहते थे कि फिल्मों में उनके होने की वजह यही फिल्म है। वे एकमात्र भारतीय हैं जिन्हें ऑस्कर अकादमी ने लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिया है। बाद मे भारत सरकार ने भी उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। उन्हीं के  नाम पर कोलकाता मे सत्यजीत रे फ़िल्म एवं टेलीवीजन संस्थान (एस.आर.एफ़.टी.आई) है... मेरे सपनों  का एक स्कूल जहाँ मै फिल्म-मेकिंग सीखना चाहता हूँ.

        उनका एक साक्षात्कार भी मिला जिसमे वह ह रहे हैं कि उन्होंने पश्चिमी दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाईं. खुद ही पढ़िए मै उसका चुनिन्दा हिस्सा यहाँ लिखता हूँ-

" फिल्म पाथेर पांचाली बनाते समय ही मैंने अपने देश के देहाती समाज से परिचय पाया। मैं शहरों में जन्मा और पला-बढ़ा था। फिल्मांकन के लिए देहाती इलाकों में घूमते और लोगों से बातें करते हुए मैंने इसे समझना शुरू किया। यह सोचना गलत है कि केवल देहातों में जन्मे लोग ही उनके बारे में फिल्में बना सकते हैं। एक बाहरी नजरिया भी काम करता है।

मुझ पर विभूतिभूषण बंदोपाध्याय का गहरा प्रभाव पड़ा। मैंने उनकी अपुत्रयी पर फिल्में बनाई हैं। उनकी पाथेर पांचाली पढ़ते हुए ही मुझे देहाती जीवन के बारे में पता चला। मैंने उनसे और उनके दृष्टिकोण से एक खास किस्म का जुड़ाव महसूस किया। यही वजह थी कि मैं सबसे पहले पाथेर पांचाली ही बनाना चाहता था। इस किताब ने मुझे छू लिया था।

मुझे टैगोर भी काफी पसंद हैं। लेकिन उनका काम देहाती नहीं। हमारा सांस्कृतिक ढांचा पूर्व और पश्चिम के मेलजोल से तैयार होता है। शहर में शिक्षित और अंग्रेजी साहित्य के क्लासिकों से परिचित हर भारतीय पर यह बात लागू होगी। सच्चाई तो यह है कि पश्चिम का हमारा बोध उन लोगों के हमारी संस्कृति के बोध से गहरा है।

एक तकनीकी कला माध्यम के रूप में सिनेमा का विकास पश्चिम में हुआ। दरअसल किसी भी तरह की समय सीमा वाली कला की अवधारणा ही पश्चिमी है। इसलिए यदि हम पश्चिम और उसके कलारूपों से परिचित हैं तो सिनेमा को एक माध्यम के रूप में अच्छी तरह समझ सकते हैं। कोई बंगाली लोक कलाकार शायद इसे न समझ पाए। इसके बावजूद फिल्में बनाते समय मैं पश्चिमी दर्शकों नहीं, अपने बंगाली दर्शकों के बारे में ही सोचता हूं।"
अच्छा लगता है न पढ़कर?  एक विज्ञापन कंपनी में ग्राफिक-स्राफिक करने वाला ओपरेटर टाइप का आदमी भारत का अकेला है जिसे दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म प्रतिष्ठा अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए ऑस्कर मिला है. ....जो एक इतालवी फिल्म देखकर फिल्मे बनाने के लिए सनक जाता है. 
धन्यवाद् सत्यजीत दा... बढ़िया सिखाया आपने हमारे जैसे ओपरेटर टाइप के एक मामूली विडियो एडिटर को. कोशिश कर रहा हूँ की आपके स्कूल में आकर भी सीखूं. 


सोमवार, 14 जून 2010

सत्येन्द्र दादा जी के याद में...

वह पटना के नाला रोड पर स्थित अपनी दवाई के दुकान चलाते थे. कब से, यह मुझे याद नहीं. शायद मेरे पैदा होने के पहले से ही. उनकी दवाई कैसी क्वालिटी की होती थी यह तो वहाँ के मरीज ही जाने लेकिन वह खुद सभी मर्ज के दवा थे. किसी निराश इंसान से १० मिनट बैठ कर बात कर लें तो उसकी सारी परेशानी ख़त्म. तो थे न वह एक दवा? एक प्रकृति निर्मित दवा.
                     नाम- सत्येन्द्र गिरी, पिता-श्री नवलकिशोर गिरी, निवासी- पटना सिटी और उम्र-४८ साल. मेरे दादाजी के चचरे भाई होने के कारण मेरे भी दादाजी हुए. कुछ दिन पहले दिल के दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गयी. लोग कहते है सत्येन्द्र बाबु नहीं  रहे. मुझे ऐसा नहीं लगता. मै उन्हें अपने आस-पास महसूस करता हूँ. इसलिए नहीं की मुझे उनसे अपने दादाजी से ज्यादा लगाव था बल्कि इसलिए की उनकी सिखाये बहुत सी चीजें अभी भी मेरे साथ है. बहुत सी यादें जुड़ी है , मैं कुछेक याद करना चाहूँगा.

मै पांचवी क्लास में पढता था. स्कूल के लिए निकलते समय अपने बस्ता के साथ -साथ साइकिल का टायर भी लेकर चलता. मतलब अपनी गाड़ी के साथ. बस्ता कही झाड़ी में छुपाकर पुरे दिन-दोपहर लिख (खेतों में ट्रेक्टर चलने के बाद उसके चक्के से जो सड़क बना जाता है उसे हमारे यहाँ 'लिख' कहते है ) पर उस टायर  को डंडे से भगा-भगाकर चलाता. शाम को ४ बजे वापिस बस्ता लेकर घर. एक दिन मम्मी को पता चल गया तो मुझे मार पड़ी. सत्येन्द्र दादा पटना से आये हुए थे. १०-१५ दिन पर खेती-बारी का हाल-चाल जानने आ जाया करते थे. मै मार खाकर आंगन में मिट्टी के चूल्हे पर बैठा था.  दादाजी सारा हाल जानने के बाद हंसते हुए मुझे उठाकर बाहर ले गए.  इस बार वो अपनी नयी बुल्लेट मोटर साइकिल से आये थे. उन्होंने मुझे पुरे लिखों पर सैर करवाया. "यह देखो , यह है असली गाड़ी. जो तुमको बिठाकर चले. लेकिन तुम जो चलाते हो वो तो नकली है. उसे चलाने के लिए तुम्हे दौड़ना पड़ता है. अगर तुम रोज स्कूल जाओगे तो बड़े होकर नौकरी करोगे फिर तुम भी ऐसा ही बुल्लेट गाड़ी खरीद लेना." उन्होंने कहा. उस दिन से मेरे दिमाग में यह बात घर कर गया की मै रोज स्कूल जाऊंगा तो मेरे पास भी ऐसा एक फटफटिया मोटर साइकिल होगा.
  हम दोनों में एक बात सामान है. उन्होंने ४८ साल के अपनी जिंदगी में एक बीड़ा पान भी मुंह में नहीं डाला. अब तक तो मैंने भी नहीं, शायद उन्ही का असर है. मेरे घराने में रात के खाना के बाद भांग पीना तो जैसे रिवाज है. एक दिन खलिहान में उनके साथ लेटे लेटे मैंने पूछा,"आईं दादा तोरा भंगवा अच्छा न लग हो? (दादाजी आपको भांग अच्छा नहीं लगता क्या?) उन्होंने समझाया- अरे उससे पेट थोड़े भरता है. वो तो एक लत है, बहुत गन्दी लत. जब तुमको किसी चीज की लत लग जाएगी न तो फिर तुम उस लत के गुलाम हो जाओगे. फिर इंसान वही करता है जो उसे नहीं करना चाहिए.
              तब बात कुछ ज्यादा समझ में नहीं आया था, लेकिन आज जब खुद को देखता हूँ बिलकुल नशामुक्त, पुरे घराना में सबसे अलग.. तब मुझे लगता है की मै उस दिन उनसे बहुत कुछ समझा था. मेरे गाँव में एक कहावत है "जतन के मधु में चुट्टी (चींटी)  ज्यादा लगता है". यह कहावत सत्येद्र दादाजी के ऊपर चरितार्थ हो गया. बहुत जतन से वे अपनी जिंदगी जी रहे थे लेकिन भगवान की उनपर टेढ़ी नजर थी. शायद हमसे ज्यादा उनकी जरुरत ऊपर वाले को था.
    दादाजी आप हमेशा मेरे साथ रहना..  .. मै आपके सिखाये रास्ते पर चलकर एक बेहतर इंसान बनना चाहता हूँ . इसके लिए मुझे आपकी जरुरत पड़ती रहेगी.
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रविवार, 13 जून 2010

गाँव के याद में,

                                               डुमरी  के  पीपल  तल  की  गलियां,
                                               जहाँ  हमने  देखि  है  खुद  को  बढ़ते  हुए,
                                               पग -पग  लेकर  पैर  को  मिट्टी से  धो  लेने  दो  
                                                यादें  कर  लेने  दो  ताज़ा ,
               इन  गलियों  में  कुछ  पल  जी  लेने  दो. 



                                                     जैसे  बतियाना  चाह  रही,
                                                     मुझसे  इनकी  दीवारें 
                                                     फुस्स -फुस्साकर, हलकी  धीमी  आवाज  में,
                                                     रुको  थोड़ा  गुफ्तगू  कर  लेने  दो

                                                                 इन  गलियों  में  कुछ  पल  जी  लेने  दो.





                                                      जलती -बुझती  सूरज  की  किरणें,
                                                      शीत  मौसम  में  भी  धुल  के  झोंके,
                                                      जैसे  माँग  रही  हो  मुझसे,
                                                      लम्बी  अनुपस्थिति  का  हिसाब,
                                                      माफ़ी  माँग  लेने  दो,
                                                     फिर  से  आने  का  पक्का  वादा  कर  लेने  दो,
                                                                    इन  गलियों  में  कुछ  पल  जी  लेने  दो.










शनिवार, 29 मई 2010

बेटियाँ......

मेरी एक दोस्त ने अपने ब्लॉग में लडकियों के अभिशप्त जीवन के ऊपर कविता और लेख लिखी है. अपने प्रगतिशील  देश में लड़कियों के ऐसे बद्दतर हालत पर मुझे भी कुछ कहने को मन करता है.
         सबसे पहले मै तेजी से तरक्की के ढिंढोरा पीटने वाले भारत के कुछ आंकडे बताता हूँ, जिसे सुनकर आप भी एक भारतीय होने पर शर्मिंदगी महसूस करेंगे.  उनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में रोजाना ७००० लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है. गुजरात में तीन ऐसे गाँव है जहाँ एक भी औरत नहीं बची है. यही नहीं देश के दूरदराज के गाँव में गर्भपात कारँव वाली वैन घुमती है. ये नंगा सच उस देश के बारे में है जिसकी राष्ट्रपति एक महिला है और जहाँ की सत्ता की धुरी एक महिला नेता के इर्द-गिर्द घुमती है.
     पाकिस्तान और नाइजीरिया जैसे देश भारत से ज्यादा पिछड़े है लेकिन वहां का लिंगानुपात भी भारत से ज्यादा बेहतर है.
यह था बेटियों का पैदा होने से पहले का दर्द. लड़कियों के साथ ज्यादती यही ख़त्म नहीं होता. "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो..." अगर यह टीस एक पढ़ी-लिखी लड़की के दिल से निकलता है तब सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की यहाँ बेटियों को किस तरह से शोषित किया जाता है. एक भारतीय परिवार की पूरी धुरी "बेटा" के इर्द-गिर्द ही घुमती है. बेटा है तो सब कुछ है बेटा नहीं तो परिवार कैसा? बेटियों के प्रति यह परायापन समाज को एक अँधेरी सुरंग में धकेल रहा है.
           कलर्स चैनल पर आने वाली धारावाहिक "बालिका बधू" इस बेटावाद के सोच पर चोट करती है. मुझे इसका एक सीन याद आ रहा है. घर के सदस्यों को पता चलता है की बहु माँ बनने वाली है. यह जानते ही परिवार का प्रत्येक सदस्य पोता होने का उद्घोष करते हुए खुशियाँ मानाने लगता है. यह कहानी एक धारावाहिक का ही नहीं है बल्कि इस देश का एक दुखद सत्य है. बेटे की चाह में दुबे भारतीय बेटियों से इस कदर नफरत करते है की कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है.
      अख़बार में रोज बलात्कार की खबरें पढ़कर हम उस पर दुःख व्यक्त कर लेते हैं, लेकिन उनकी भावनाओं के  साथ प्रत्येक क्षण बलात्कार होता है यह शायद ही कोई समझने की कोशिश  करता है.
 बेटियों से नफरत ऐसे हीं किया जाता रहा तो निश्चित है की इसका व्यवस्थित सामाजिक ढांचे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. जो परिवार इस संकीर्ण मानसिकता को छोड़ने को तैयार नहीं उनके लिए परिवार कानून के बन्धनों को इतना कठोर बनाने की जरुरत है की स्वपन में भी बेटियों को प्रताड़ित करने की कल्पना न कर सके.