मंगलवार, 1 सितंबर 2009

आज के भोजपुरिया गनवा...

पिछले दिनों मै अपने नालंदा स्थित गाँव गया जा रहा था। रास्ते में बस में एक भोजपुरी गाना बज रहा था--"मिस कॉल मारा तारु किस देबू का हो, अपने मशिनिया में पिस देबू का हो...." दो दिनों के गहन अध्ययन के बाद मुझे इस गाने का मतलब हिन्दी में समझ में आया। मै आश्चर्यचकित रह गया था। भोजपुरी संगीत ने सारी सीमाओं को तोड़कर इतनी तरक्की कर ली है!

बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के मध्यवर्गीय लोग शाहरुख़ खान से ज्यादा मनोज तिवारी और "निरहुआ" को जानते है। यह अजीब बिडम्बना है की भोजपुरी फ़िल्म जगत में वही स्टार बनते है जो पहले हित गायक रह चुके होते है। या कन्हें तो पब्लिक उसी को स्वीकार करती है जो "हिला देने वाला" गाना भी जानता हो। फिल्में भी इन्ही लोंगो की हिट होती है क्यूंकि ये ड्राईवर, कंडक्टर और पन्वारियोंके आदर्श होते है। सत्तर-अस्सी के दशक के भोजपुरी गाने किसको याद है? हाँ, मेरी माताजी को १९६१ में आई फ़िल्म "गंगा मैया तोहरे पियरी चधैवो" का टाइटल गाना पुरा याद है। इस गाने को मैंने यू-ट्यूब पर जाकर देखा। बनारस की घांट, साफ़-सुथरी गंगा की धारा, जिसमे पचासों नांव और उन्ही नावों में से एक पर बैठी पद्मा खन्ना गीत गाती हुयी। सब कुछ इतना मनोरम की बस उसमे डूब जाने को मान करता है।

पद्मा खन्ना तब की भोजपुरी सुपर स्टार थी। अब वह अमेरिका में रहती है और शास्त्रीय नृत्य सिखाती है। उनसे एक बार भोजपुरी फ़िल्म जगत के बारे में कुछ पूछा गया तो उन्होंने दो टूक कहा की अब के भोजपुरी गानों में अश्लीलता और फूहड़पन के अलावा कुछ नही है। ।यह कानफोडू डिस्को और डीजे तो अभी आया है। दशक पहले पुरे देश में शादिओं में शारदा सिन्हा के गीत बजा करते थे। भारत शर्मा "व्यास" और बालेश्वर के भोजपुरी गीत आज भी पौढ़ लोंगो के जुबान पर आ जाता है।

भोजपुरी का बाजार अब ८०० करोड़ रुपये का हो गया है। इस बाजार में ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी के लिए अश्लीलता परोसने की होड़ सी लगी है। वो एल्बम हिट हो जाता है जिसमे जीजा-साली के अश्लील संवाद होते है। जीजा-साली से मुझे याद आया होली के गीत के बारे में। होली के दिनों में यदि अपने भोजपुरी के जीजा-साली और देवर-भौजी वाला गीत सुनकर यदि ठीकठाक अंदाज लगा लिया तो आप दांतों टेल उंगली चबा लेंगे। सब मिला कर ऐसा हो गया है भोजपुरिया संगीत। बिहार में तो सीडी क्रांति ऐसे चल रहा है जैसे भारत में मोबाइल क्रांति। दिल्ली में मुझे १०-१२ रुपये में एक खाली सीडी मिलता है, लेकिन बिहार के छोटे -मोटे बाजार में भी ८-१० रुपये में आपको एक भोजपुरिया एल्बम मिल जायेंगे, जिसमे १०० से अधिक गाने होंगे।

भोजपुरी कैफी आजमी, जेपी और बिस्मिल्लाह खान का भाषा रहा है लेकिन निश्चित ही इन भोजपुरी गीतों ने भोजपुरी को दुनिया से काट दिया है। जब "महुआ" नाम से भोजपुरी के अलग चैनल खुले तो भी मुझे लगा था की यह भी दंतनिपोरी और फूहड़पन ही बेचेंगे , लेकिन महुआ पर आने वाले कार्यक्रम देखकर भोजपुरी भाषा वालो को कुछ आस जगी है। हर तरह के कार्यक्रम ला रही है धीरे-धीरे । बिल्कुल मिटटी से जुड़ी हुयी। खासकर "सुर-संग्राम"। इस प्रोग्राम तो लोंगो की सोच बदल दी। नेताओं ने सन २००० में बिहार को दो हिस्सों में बाँट दिया। जिसे मिलाने का काम कर रही है यह कार्यक्रम। बहुत अच्छा लगा यह देखकर की संगीत के इस अखाडे में बिहार और झारखण्ड के धुअन्धर एक साथ है। दो टीम है -बिहार और उत्तरप्रदेश। यहाँ तो बिहार और झारखण्ड साथ -साथ है। नेताओं के सोच से बिल्कुल अलग। ऐसा नही है की आज के सारे भोजपुरी गीत ही सुनाने लायक नही है। देवी के "बहे के पुरवा रामा ....." और "परदेसिया...." ऐसे ही गीत है जिसमे असली भोजपुरिया का स्वाद है। फिल्मों की बात किया जाए तो कुछ दिनों पहले आई "कब ऐबहू अंगनवा हमार...." जैसे फिल्मों में काफी कुछ है देखने लायक। संक्षेप में , भोजपुरी के लिए अब कम से कम कला क्षेत्र से जुड़े हुए लोंगो को सोचने की जरुरत है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. चलिए कहीं तो अच्छी शुरुआत हुई . भोजपुरी जैसी मधुर बोली के साथ बहुत अत्याचार हो चुका

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  2. बहुत बढियां आलेख, सुन्दर प्रस्तुती. आभार.

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

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  3. badhiya likhe hai aap.. aisi soch rakhne se hi bhojpuri ka kalyan hoga...

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